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5/17/18

भगवान क्या है?

भगवान क्या है-

भगवान क्या है? what is god?

what is god?

भगवान क्या है? क्या भगवान का अस्तित्व है? अगर हां तो वह कहां है ?जब से हम पैदा हुए हैं तब से इस प्रश्न ने हमें कभी ने कभी परेशान जरुर किया होगा मुझे तो बहुत परेशान किया है  भगवान क्या है? what is god? अगर आप भी इस विषय में सोचते हैं तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं।भगवान क्या है
हम सभी इश्वर को पवित्र मानते हैं लेकिन सृष्टि को अपवित्र मानते हैं लेकिन यह कैसे संभव है कि इश्वर पवित्र हो और उसका एक अंग अपवित्र


 अब एक एक करके हम सारे point समझने की कोशिश करते हैं सबसे पहली बात हमारे मन में ईश्वर का ख्याल आया ही क्यों? क्योंकि आप पैदा हुए तो आपने सृष्टि को देखा आप के सम्मुख इतनी विशाल सृष्टि थी और आप इस रचना से अचंभित थे।


आपके और हमारे इस सृष्टि मे आने से पहले यहां कितना कुछ हो चुका था तब आपने सोचा कि मैंने तो यह सब नहीं रचा पर इतना सब कुछ आया कैसे? मेरे आस पास भी सभी लोग मेरी ही तरह दिखते हैं लेकिन यह भी सृष्टि को नहीं बना सकते अतः कोई ना कोई इस सृष्टि का रचयिता जरुर रहा होगा।

क्योंकि हम सब इंसान हैं तो हम सब ने सोचा कि वह रचियता एक बहुत बड़ा इंसान होगा मेरे जैसा छोटा आदमी तो यह सब सृष्टि की रचना नहीं कर सकता वह निश्चित रुप से बहुत बड़ा इंसान होगा। शायद उसके चार या आठ हाथ हो शायद उसके पास तीन सिर या तीन आंखें होंगी।
bhagwan kya hai?
lord of universe

 लेकिन कल्पना किजिये अगर आप एक भैंसा होते तो शायद आप यह सोचते कि भगवान एक बहुत बड़ा भैंसा होगा शायद जिससे चार सींग हो।इसी तरह अगर आप कुत्ते होते तो आप यह सोचते कि भगवान ने बहुत बड़ा कुत्ता होगा जिसके पास मुझसे ज्यादा दांत हो या 3-4 सिर हो।

what is god
god

ठीक वैसे ही जैसा कि हमारे बीच गोरों के भगवान गोरे होते हैं और कालों के काले। जैसा कि हमारे भारत में कई भगवान पाए जाते हैं स्त्री भगवान ,पुरुष भगवान ,बंदर भगवान, गाय भगवान और पत्थर भगवान। जब संसार में पुरुष शक्तिशाली रहे थे तो पुरुष भगवान बने और जब औरत  शक्तिशाली हुई तो उन्होंने इस बात पर विरोध जताया  कि भगवान एक स्त्री क्यों नहीं हो सकती ?

इस तरह बने स्री भगवान। अगर आने वाले समय मे किसी भैंसा को बहुत सारी ताकत मिल जाए तो वह भी पूछेंगे कि भगवान के एक भैंसा क्यों नहीं हो सकता?
भगवान के संबंध में हमारा जो विचार है वह हमारे द्वारा बढ़ा चढ़ाकर बनाया गया एक संस्करण मात्र है।


 हम अभी तक खुद को ही परिभाषित नहीं कर पाए हैं कि हम कौन हैं? और हमारा सृष्टि में क्या काम है? हम इस संबंध में जो भी परिभाषित करेंगे वह हमेशा गलत ही साबित होगा इस सम्बन्ध मे किसी भी प्रकार की परिभाषा गलत ही साबित होगी।


जीवन को समझने के लिए जब सृष्टि का ये छोटा सा टुकड़ा ऐसा है तो सृष्टि की स्रोत को आप कैसे परिभाषित कर सकते हैं आप ना ही  इसे परिभाषित कर सकते हैं और ना ही इसे समझ सकते हैं आप बस इस में विलीन हो सकते हैं और इस का अनुभव करते हैं। आप इसे  ज्ञान नहीं बना सकते।


आप हमको ईश्वर के बारे में जो भी जान है वह पूरी तरह सांस्कृतिक बकवास मात्र है हम जिस भी प्रकार की संस्कृति में हम होते हैं हमारा ईश्वर भी उसी प्रकार का होता है। इसका  इसमें विलीन होकर अनुभव किया जा सकता है ना कि इसे परिभाषित किया जा सकता है।


इसीलिए हम पूजा-पाठ, मंत्र, जप करके या आद्यात्मिक जीवन  व्यतीत करके उसमें विलीन होने के उपाय तलाश रहे हैं ताकि हम उस दिव्य शक्ति का अनुभव कर सकें वही दिव्य शक्ति जो हम सभी से काफी विशाल है।


धन्यवाद 
(-silent writer)
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